राजमा की खेती, पैदावार एवं व्यापारिक लाभ।

परिचय:- भारत एक ऐसा देश है जहां क्षेत्रों में विविधता के साथ साथ खाने में भी विविधता है। और ऐसी ही प्रशिद्ध खाने में एक नाम राजमा का भी है। भारत में राजमा चावल लोगो की पसंदीदा खाने में से एक है, और इसके बहुत सारे फायदे भी है इस वजह से इसकी खेती से किसानो को भी काफी अच्छी आमदनी होती है।

भारत एक ऐसा देश है जहां क्षेत्रों में विविधता के साथ साथ खाने में भी विविधता है। और ऐसी ही प्रशिद्ध खाने में एक नाम राजमा का भी है।
राजमा


राजमा दिखने में किडनी के आकार का होता है जिस कारण से उसे किडनी बींस भी कहा जाता है, राजमा लैगुमिनोसि परिवार का पौधा है जिसका उपकुल पेपीलियोनेसि है। राजमा की खेती पहाड़ी जगहों पे की जाती है पर अब नयी तरीको से इसकी खेती उत्तरी भारत के खेतों में भी की जाती है। जिससे किसान काफी उत्साहित है और हर किसान राजमा की खेती करना चाहता है।


भारत में इसकी खेती महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में मुख्य रूप से की जाती है।

राजमा के फायदे:- राजमा में काफी पोषक तत्व पाये जाये है जैसे कि पोटेशियम, प्रोटीन, मैग्नीशियम आदि जो की हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है। राजमा खाने से हमारे ब्लड प्रेशर को नियंत्रण रखने में, कैंसर से बचाव करने में, डायबिटीज में, हड्डियां मजबूत बनने में, वजन कम करने में तथा कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखने में मदद मिलता है।

राजमा की किस्में:- राजमा के कई किस्में होती है जिसे अलग अलग जगहों की मिट्टी और वातावरण के अनुसार खेती की जाती है।

पी.डी.आर. 14:- इस राजमा को उदय भी कहा जाता है। यह लाल चित्तीदार रंग का होता है और यह बीज रोपण के 125-130 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 30 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।

एच.यू.आर 15:- यह सफ़ेद रंग का होता है और यह भी बीज रोपण के 125-130 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 20-25 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।

मालवीय 137:- यह लाल रंग का होता है और इसकी ज्यादातर खेती उत्तर पूर्वी भारत और महाराष्ट्र में की जाती है। यह बीज रोपण के 115-120 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 25-30 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।

अम्बर:- अम्बर राजमा लाल चित्तीदार रंग का होता है और यह बीज रोपण के 125-130 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 25-30 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।

उत्कर्ष:- उत्कर्ष राजमा की खेती पछेती पैदावार के रूप में होता है। यह गहरा लाल रंग का होता है और यह भी बीज रोपण के 130-135 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 20-25 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है।

वी.एल. 63:- यह भूरे चित्तीदार रंग का होता है और यह बीज रोपण के 120-125 दिन बाद पकता है। इसका उत्पादन 25 किवंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाता है। यह राजमा दोनों मौसम में उगाया जाता है।

इसके अलावा राजमा के और भी कई किस्में है जैसे की आई.आई.पी.आर 96-4, आई.आई.पी.आर 98, हूर -15, एच.पी.आर 35, बी.एल 63,अरुण।

राजमा की कीमत:- राजमा की कीमत 100-160 रूपये तक होती है और इसकी चित्रा किमत 7600-10400 रुपये प्रति क्विंटल होती है।

उपयुक्त मिट्टी:- राजमा की खेती के लिए कार्बनिक गुणों वाली चिकनी मिटटी अच्छा माना जाता है जिसकी pH 5-6 हो।

राजमा की खेती का समय एवं जलवायु

खेती का समय:- भारत में अलग अलग राज्यों में रबी और खरीफ दोनों ऋतू में राजमा की खेती की जाती है और बुवाई का समय भी हर राज्य में अलग होता है। बिहार और यूपी में नवम्बर, महाराष्ट्र में अक्टूबर के बीच का समय अच्छा होता है।

भारत में अलग अलग राज्यों में रबी और खरीफ दोनों ऋतू में राजमा की खेती की जाती है और बुवाई का समय भी हर राज्य में अलग होता है। बिहार और यूपी में नवम्बर, महाराष्ट्र में अक्टूबर के बीच का समय अच्छा होता है।
राजमा की खेती

प्राथमिक किस्मों को अक्टूबर के अंत में और देर तक जाने वाली किस्मों को नवंबर में बोया जाता है। खरीफ ऋतु की फसल के लिए मई बीच से जून बीच तक के समय में बोना अच्छा है वहीँ वसंत ऋतू के फसल के लिए फरवरी से मार्च के पहले सप्ताह में बुनाई अच्छा होता है।

जलवायु:- यह फसल वार्षिक 60 -150 सेमी वर्षा वाले उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण जगहों में अच्छी तरह से बढ़ती है।अच्छी उपज के लिए 15-25 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आदर्श होता है।

बीज कहाँ से ख़रीदे:- सही बीज को चुनना बहुत जरुरी है|इसके लिए सही मात्रा और सही गुण का पता होना बहुत जरुरी है। बीज भंडार केंद्र से बीज खरीदना या फिर किसी भी सरकारी मान्यता प्राप्त संसथान से ख़रीदा जा सकता है।

बुआई:- राजमा की बीज की 120-140 किलोग्राम प्रति हेक्टर लगाई जाती है। राजमा की बुवाईलाइन में होती है दो लाइन के बीच में 12-16 इंच की दूरी , दो पौधे के बीच में 4 इंच की दूरी और बुवाई 3-4 इंच गहराई होनी चाहिए।

सिंचाई:- राजमा को 2-3 सिचाई की जरुरत पड़ती है। बुआई के बाद 4 सप्ताह बाद पहली हलकी सिंचाई होनी चाहिए। इसके बाद की सिचाई एक महीने के अंतराल में होनी चाहिए ताकि पानी खेत में ना ठहरे।

इसके बाद गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के समय थोड़ी सी मिट्टी पौधे पे चढ़ा देना चाहिए जिससे कलियाँ आने पे पौधा गिर ना जाये। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के बाद पेंडीमेथालिन छिरकव 3.3 लीटर प्रति हेक्टर के हिसाब से 700-800 लीटर जल में मिला के छिड़काव करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण:- खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक दोनों तरीकों से कर सकते है।
प्राकृतिक तरीके का खरपतवार नियंत्रण पौधे के लिए पहली गुड़ाई बीज रोपाई के 20-22 दिन बाद करनी चाहिए। जिससे पौधे की जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे, दूसरी गुड़ाई 15 -20 दिन बाद करनी चाहिए। राजमा के पौधे के लिए दो गुड़ाई ठीक होता है।

रासायनिक तरीके का खरपतवार नियंत्रण पौधे के लिए उचित मात्रा में पेन्डीमेथलीन का इस्तेमाल करना चाहिए। बीज रोपाई के तुरंत बाद पेन्डीमेथलीन छिड़क देना चाहिए। जिससे खेत में खरपतवार जन्म नहीं लेते, और जन्म लेते भी है तो उनकी मात्रा बहुत कम होती है।

रोग एवं रोकथाम:-राजमा के पौधे में कई तरह के रोग देखा जाता है। हमें समय रहते इन् रोगों को नियंत्रण कर लेना चाहिए नहीं तो यह हमारी फसल को खराब कर सकता है।

तना गलन:- जब खेत में पानी भर जाता है तब यह रोग देखा जाता है। अंकुरण के समय इस रोग को ज्यादा देखा जाता है। जब राजमा के पौधे में यह रोग लगता है तब राजमा की पत्तियों पर भूरे पीले रंग के जलीय धब्बे आ जाते है और समय के साथ यह धब्बे बढ़ने लगते है और पत्ते सूखकर गिर जाते है।

रोकथाम:- तना गलन रोग से पौधे को बचने के लिए उसपे उचित मात्रा में कार्बेन्डाजिम छिड़क देना चाहिए।

कोणीय धब्बा:- यह रोग फफूंद की वजह से होता है। जब राजमा के पौधे में यह रोग लगता है तब राजमा की पत्तियों पर भूरे लाल रंग के जलीय धब्बे आ जाते है और समय के साथ यह धब्बे बढ़ने लगते है और पत्ते गल जाते है।

रोकथाम:- कोणीय धब्बा रोग से पौधे को बचने के लिए उसपे उचित मात्रा में कार्बेन्डाजिम को छिड़क देना चाहिए।

माहू:- राजमा के पौधे में यह रोग तब देखा जाता है जब पौधे पे फल आना शुरू होता है। इस रोग में कीट पौधे के कोमल भागों का रस चूसकर पौधे के विकास को अभावित करते हैं। इस रोग से राजमा का बनावट बदल जाता है।

रोकथाम:- इस रोग से पौधे को बचने के लिए उसपे उचित मात्रा में मिथाइल डेमेटान या इमिडाक्लोरोप्रिड छिड़क देना चाहिए।

फली छेदक:- यह एक किट रोग है जिसमे किट फल में छेद कर के बीज को खा जाते है इस कारन से राजमा के पैदावर में बोहोत नुकशान होता है।

रोकथाम:-इस रोग से पौधे को बचने के लिए उसपे उचित मात्रा में नीम के तेल, एन.पी.वी. या मोनोक्रोटोफास छिड़क देना चाहिए।

पर्ण सुरंगक:- इस रोग को पौधे के पत्तों पे देखा जाता है। इस रोग के कीट पौधे के पत्तों में सुरंग बना कर उस में ही रहते है और पत्तों के हरे भाग को खा जाते हैं। जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बंद हो जाती है और पौधे का आकार भी छोटा रह जाता है।

रोकथाम:-इस रोग से पौधे को बचने के लिए उसपे उचित मात्रा में डाईमिथोएट या इमिडाक्लोरोप्रिड छिड़क देना चाहिए।

फसल की कटाई:-राजमा का फल जब 125-130 दिन में पक जाये तो उसे काट के 1 दिन के लिए खेत में ही छोड़ देना चाहिए। उसके बाद मड़ाई करके दाना निकाल लेना चाहिए। ज्यादा सूखने पर फल का दाना चटक कर बीज नीचे गिर जाता है।

पैदावार:- तकनीकियों का इस्तेमाल कर के खेती करने पर 1500-2000 किलो प्रति हैक्टर उपज मिल सकता है।

फसलबाज़ार

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