कपास की खेती की तैयारी, इसके महत्व एवं व्यापार।

अप्रैल मई इसके लिय उपयुक्त समय माना जाता है, जिससे फसल को पकने का पूरा समय मिल जाता है। लेकिन इसके लिय सिंचाई की व्यवस्था अनिवार्य है । अन्यथा पहली बारिश के बाद खेत में उर्वरक डालकर तुरंत बीजों की रोपाई कर देनी चाहिए।

परिचय:- कपास की खेती भारत में की जाने वाली एक सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसल है। यह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपनी एक अहम भूमिका निभाता है। दुनियाभर में भारत एक मात्र ऐसा देश है जहाँ का कपास विश्व में वस्त्र उत्पादन में कच्चा माल (सूती फाइबर) प्रदान करता है। बाजार में इसकी कई प्रजातियां उपलब्ध है, जिनसे ज्यादा पैदावार मिलती है।

कपास की खेती भारत में की जाने वाली एक सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसल है। यह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपनी एक अहम भूमिका निभाता है।
कपास की खेती

इसकी खेती में ज्यादा मेहनत लगती है। इसका उपयोग कपड़ा बनाने में लगता है। इसके बीज से तेल निकाला जाता है, बचा हुआ भाग पशुओं को खिलाया जाता है। इसको सफ़ेद सोना कहा जाता है।

खेती:- इसकी खेती हर जगह की जा सकती है। वैसे शुरुआत में न्यूनतम तापमान 16 डिग्री से. तापमान की आवश्यकता होती है। फसल बढ़ते समय 21 से 27 डिग्री से. तापमान उपयुक्त माना गया है। वैसे खेती के लिए बलुई, क्षारीय, कंकड़युक्त एवं जलभराव वाली भूमियां उपयुक्त रहती है। अन्य भूमियों में भी इसकी खेती की जा सकती है।

किस्में:- बाजार में इसकी कई उन्नत किस्में आती है।

1) छोटे रेशों वाली कपास

2) मध्यम रेशों वाली कपास

3) बड़े रेशों वाली कपास

कपास के खेत की तैयारी, रोपाई और सिंचाई।

खेत की तैयारी:- खेत की अच्छी तरह से जुताई करके उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें। कुछ दिनों बाद गोबर की खाद डालें , इसके बाद खेत की 2 से 3 बार जुताई कर दें। फिर बारिश न होने की स्थिति में खेत में पानी छोड़ दें तथा पानी सूखने के बाद फिरसे जुताई करें। फिर मिट्टी का पाटा लगा दें तथा खेत में उर्वरक डालकर खेत की जुताई के साथ-साथ खेत में पाटा लगायें। इसके एक दिन बाद शाम के वक्त बीज को लगाएं।

खेत की अच्छी तरह से जुताई करके उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें। कुछ दिनों बाद गोबर की खाद डालें , इसके बाद खेत की 2 से 3 बार जुताई कर दें। फिर बारिश न होने की स्थिति में खेत में पानी छोड़ दें तथा पानी सूखने के बाद फिरसे जुताई करें।
कपास

बीज रोपाई का समय:- अप्रैल मई इसके लिय उपयुक्त समय माना जाता है, जिससे फसल को पकने का पूरा समय मिल जाता है। लेकिन इसके लिय सिंचाई की व्यवस्था अनिवार्य है। अन्यथा, पहली बारिश के बाद खेत में उर्वरक डालकर तुरंत बीजों की रोपाई कर देनी चाहिए।

रोपाई का तरीका:- देशी किस्म में 2 पौधों के बीच 30-35 सेमी, कतारों के बीच 40 सेमी तथा अमेरिकन किस्म में कतारों के बीच 50-60 सेमी और पौधों के बीच 40 सेमी की दूरी अनिवार्य है। एक एकर में 4 किलो बीज लगाया जाता है, इसको जमीन के अंदर 4 से 5 सेमी नीचे डाला जाता है। इसके अलावा अधिक क्षारीय भूमि में मेड़ों के ऊपर बीज लगाया जाता है।

सिंचाई आधारित क्षेत्र के लिय फसल चक्र:- कपास- गेहूं या जौ, कपास- बरसीम या जई, कपास- सूरजमुखी एवं कपास-मूँगफली।

उत्तरी भारत में कपास:- गेंहू , मटर, ज्वार उत्तर भारत में इसके साथ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें (फसलचक्र) हैं।

तुरई:- इसकी तुरई सितम्बर-अक्टूबर महीनें में होती है। देशी किस्म की पैदावार 25- कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा अमेरिकन किस्म की 30 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है। एक हेक्टेयर भूमि में किसान 2.5 लाख से अधिक की कमाई आसानी से कर सकता है।

फसल बाज़ार

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