मूली की खेती तथा इसके व्यापारिक महत्व।

मूली एक जड़ों वाली सब्जी है । यह एक उष्णकटिबंधीय फसलब है। यह सयंमी क्षेत्र की फसल है। यह एक जल्दी उगने वाली तथा सदाबहार फसल है। इसकी खाद्य जड़ें सफेद से लाल रंग की होती हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, पंजाब तथा आसाम में मुख्य रूप से इसकी खेती की जाती है।

परिचय:- मूली एक जड़ों वाली सब्जी है, यह एक उष्णकटिबंधीय फसल है। यह सयंमी क्षेत्र की फसल है, यह एक जल्दी उगने वाली तथा सदाबहार फसल है। इसकी खाद्य जड़ें सफेद से लाल रंग की होती हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, पंजाब तथा असम में मुख्य रूप से इसकी खेती की जाती है।

जलवायु:- तापमान 18-25 डिग्री, वर्षा 100-125 cm, वृद्घि हेतु तापमान 30-40 डिग्री।

स फसल को अनेक किस्मों की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन परिणाम की दृष्टि से भुरभुरी, रेतली दोमट मिट्टी उत्तम है। भारी और ठोस मिट्टी में खेती न करें, तथा फसल के बढ़िया विकास के लिए pH मान 5.5-6.8 होना चाहिए।
मूली

मिट्टी के प्रकार:– इस फसल को अनेक किस्मों की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन परिणाम की दृष्टि से भुरभुरी, रेतली दोमट मिट्टी उत्तम है। भारी और ठोस मिट्टी में खेती न करें, तथा फसल के बढ़िया विकास के लिए pH मान 5.5-6.8 होना चाहिए।

किस्में तथा पैदावार

जैपनीज व्हाइट:- यह किस्म नवंबर-दिसंबर के महीने में बुआई हेतु अनुकूल है। इसे भारत में जापान से लाया गया था। इसकी औसतन पैदावार 160 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है।

पूसा चेतकी:- यह किस्म अप्रैल से अगस्त तक बोने के लिए अनुकूल है। यह जल्दी पकने वाली किस्म है। याह पंजाब में खेती करने के लिए अनुकूल है। इसकी जड़ें नर्म तथा बर्फ जैसी सफेद और मध्यम लम्बई होती है। इसकी औसतन पैदावार 105 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है।

पूसा हिमानी:- इस किस्म की बुआई जनवरी-फरवरी महीने में शाम के समय की जाती है। इसकी जड़ें सफेद होती हैं, यह बुआई के 60-65 दिनों बाद कटाई के लिए तैयार होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 160 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है।

पूसा रेशमी:- यह अगेती बुआई के लिए उत्तम मानी गई है। यह 50-60 दिनों में कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है।

अर्का निशांत: यह लंबी और गुलाबी जड़ों वाली किस्म है।

मूली के खेत की तैयारी एवं खरपतवार नियंत्रण।

खेत की हल से जुताई करने के बाद पाटा लगाकर समतल कर दें। खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद को 5 से 10 टन प्रति एकड़ खेत में मिलाएं। यदि रूड़ी अच्छी तरह से ना गली हो तो ना डालें, इससे जड़ें दोमुंही निकलती है।

खेत की हल से जुताई करने के बाद पाटा लगाकर समतल कर दें। खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद को 5 से 10 टन प्रति एकड़ खेत में मिलाएं। यदि रूड़ी अच्छी तरह से ना गली हो तो ना डालें, इससे जड़ें दोमुंही निकलती है।
मूली की खेती

(रूड़ी:- मवेशियों के मूत्र सोखी हुई पराली )

बीज की मात्रा:- 4-5 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ काफी है। उचित विकास के लिए बुुुआई मेंड़ों पर करें।

खरपतवार नियंत्रण:- नदीनों की रोकथाम और मिट्टी को हवादार बनाने के लिए अच्छी तरह गोडाई करें। पहली गोडाई बुआई के 2-3 सप्ताह बाद करें। गोडाई के तुरंत बाद मेंड़ों पर मिट्टी चढ़ाए।

कटाई:- फसल की किस्मों के अनुसार, मूली बुआई के 25-60 दिनों के बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। हाथों से पौधे को उखाड़ कर मूली के जड़ों को धोएं और इनके आकार के अनुसार छांटे।

कटाई के बाद:- कटाई के बाद मूली को उनके आकार के अनुसार छांटे। मूली का बाजारीकरण देर से किया जाता है, अतः इन्हे बोरियां और टोकरी में रखा जाता है।

फसलबाज़ार

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