रेशम के कीटों का पालन, परिचय तथा व्यापार।

कच्चा रेशम के लिए रेशम के कीटों का पालन किया जाता है इसे सेरीकल्चर कहते है। इसके वस्त्र रानी के नाम से विख्यात है इसे विलासिता, मनोहरता, विशिष्टता एवं आराम का सूचक माना जाता है।

परिचय:- कच्चा रेशम के लिए रेशम के कीटों का पालन किया जाता है इसे सेरीकल्चर कहते है। इसके वस्त्र रानी के नाम से विख्यात है इसे विलासिता, मनोहरता, विशिष्टता एवं आराम का सूचक माना जाता है।

रेशमकीट जिसे इल्ली कहते हैं, के द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है। ये विशेष पौधों पर पलते हैं इसलिए इन्हें कृषि के साथ जोड़ा जाता है।

ये अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में कोसों का निर्माण करते हैं इनका जीवन-चक्र 4 चरणों का होता है, अण्डा, इल्ली, प्यूपा तथा शलभ।

रेशमकीट जिसे इल्ली कहते हैं, के द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है। ये विशेष पौधों पर पलते हैं इसलिए इन्हें कृषि के साथ जोड़ा जाता है।
रेशमकीट

रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन-चक्र में कोसों के चरण पर अवरोध डाला जाता है जिससे व्यावसायिक महत्व का तन्तु निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है।

इसे अब एक कृषि ऊद्योग के रूप में देखा जाता है। इसे कृषि आधारित कुटीर उद्योग भी कह सकते हैं। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्रों में लगाया जाता है।

इसे कृषि के साथ-साथ अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इसमें अनेक अलग-अलग रोजगार का सृजन भी होता है। यह ऊद्योग पर्यावरण के लिए भी मित्रवत है।

यह भारत में हजारों वर्षों से है यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है। रेशम उत्पादन में भारत विश्व में दूसरे नंबर पर आता है।

इसेके प्रत्येक किस्म का उत्पादन किसी न किसी भारतीय इलाके में अवश्य होता है। भारतीय बाजार में इसकी खपत भी ज्यादा है, उद्योग के विस्तार को देखते हुए इसमें रोजगार की काफी संभावनाएं हैं।

फैशन उद्योग के काफी करीब होने के कारण उम्मीद की जा सकती है कि इसकी डिमांड लगातार बढ़ने की संभावना है।

मूंगा रेशम के उत्पादन में भारत इकलौता देश है इसका एकाधिकार है। यह कृषि क्षेत्र की एकमात्र ऐसी नकदी फसल है, जो 30 दिन के भीतर प्रतिफल प्रदान करती है।

इसेके इन किस्मों के कीटों का उत्पादन मध्य भारत तथा पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लोग करते हैं।

इसका मूल्य बहुत अधिक होता है और उत्पादन बहुत ही कम होती है। विश्व के कुल कपड़ा उत्पादन का रेशम केवल 0.2 फीसदी ही है।

रेशम की किस्में तथा उत्पादन।

रेशम उत्पादन में भारत:- एशिया में इसका सबसे अधिक उत्पादन होता है जो विश्व के कुल उत्पाद का 95% है।

इसका उत्पादक 40 देशों में भारत का स्थान दूसरा है। साथ ही भारत इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है भारत में शहतूत प्रजाति के रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है।

जबकि गैर-शहतूत प्रजाति के रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है।

इसका उत्पादक 40 देशों में भारत का स्थान दूसरा है। साथ ही भारत इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है भारत में शहतूत प्रजाति के रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है।

कोकून

रेशम की किस्में:- व्यावसायिक दृष्टि से कुल 5 रेशम किस्में लाभदायक होती हैं जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियों से प्राप्त होती हैं।

जो की इस प्रकार है, शहतूत, ओक तसर एवं उष्णकटिबंधीय तसर, तथा मूंगा एरी।

रेशम उत्पादन:-इसका उत्पादन एक कृषि आधारित कुटीर उद्योग है। इसमें कच्चे रेशम के उत्पादन हेतु रेशमकीट पालन खाद्य पौधों पर किया जाता है।

कच्चा रेशम एक धागा होता है जिसे कुछ विशेष कीटों के द्वारा कते कोसों से प्राप्त किया जाता है।

उत्पादन के फायदे:- इसमें रोज़गार की पर्याप्त क्षमता है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार का मुख्य श्रोत बन सकता है। इसके द्वारा कम समय में अधिक आय की जा सकती है।

यह महिलाओं के अनुकूल व्यवसाय में से एक है। यह समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए आदर्श कार्यक्रम है जो अधिक पूँजी नहीं लगा सकते।

भारत के विख्यात रेशम राज्य:- आंध्रप्रदेश, असम, बिहार, गुजरात, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश एवं पश्चिम बंगाल।

केन्द्रीय पारीयोजना एवं बनारस की ज़री।

बनारस की ज़री:- पवित्र गंगा नदी के गोद में स्थित वाराणसी, अपनी रेशमी साड़ियों एवं ज़री के लिए प्रख्यात है। यहाँ की साड़ियां हल्के रंग पर पत्ती, फूल, फल, पक्षी आदि की घनी बुनाई वाली डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध हैं।

यहाँ रेशमी साड़ियों पर गाँज़ी चांदी तथा सोने के तारों से भी बुनाई की जाती है। कमखाब बनारस का एक पौराणिक परिधान है।

जिसमें सोने तथा चांदी के धागों की सुनहरी बुनावट होती है। शुद्ध रेशम में सोने की कारीगरी बाफ्ता कहलाती हैं तथा रंग-बिरंगे रेशम में महीन जड़ी आमरु।

बांध कर रंगाई करने की कला:- भारत में रंगाई की यह तकनीक सदियों पुरानी है। इस तकनीक की मुख्य रूप से दो परंपराएं है। पटोला अथवा ईकत। बंधेज अथवा बंधिनी।

केन्द्रीय पारीयोजना:- केन्द्रीय रेशम बोर्ड देश में रेशम उत्पादन एवं उद्योग के विकास के लिए 1948 के दौरान गठित एक सांविधिक निकाय है।

इसेके कारोबार में वृद्धि के लिए सरकारें लगातार प्रयासरत है तथा अनेक योजनाएं ला रही है।

जिनका उद्देश्य है अनुसंधान तथा विकास, और अनुसंधान विस्तार, चार स्तरीय रेशमकीट बीज उत्पादन नेटवर्क का उचित रखरखाव, वाणिज्यिक रेशमकीट बीज उत्पादन के नेतृत्व में अग्रणी भूमिका निभाना।

विभिन्न उत्पादन प्रक्रियाओं का मानकीकरण एवं गुणवत्ता प्राचलों की शिक्षा, घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय रेशम की उपलब्धता तथा रेशम उत्पादन एवं रेशम उद्योग से संबंधित सभी नीतियों तथा उससे संबंधित मामलों पर संघ सरकार को सलाह देना।

फसलबाज़ार

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