ज़ुकिनी की खेती, फायदे तथा व्यापारिक लाभ।

ज़ुकिनी जिसे चप्पन कद्दू भी कहा जाता है, की बुआई अप्रैल या फिर नवंबर-दिसंबर में की जाती है। यह कद्दु वर्ग की सब्जी है जिसकी पहले सिर्फ विदेशों में ही खेती होती थी लेकिन अब भारत में भी होने लगी है। इसके पौधे झाड़ियों के जैसे होते है। ज़ुकिनी 1.5 से 3 फीट लम्बे या फिर गोल हो सकते है।

परिचय:- ज़ुकिनी जिसे चप्पन कद्दू भी कहा जाता है, की बुआई अप्रैल या फिर नवंबर-दिसंबर में की जाती है। यह कद्दु वर्ग की सब्जी है जिसकी पहले सिर्फ विदेशों में ही खेती होती थी लेकिन अब भारत में भी होने लगी है। इसके पौधे झाड़ियों के जैसे होते हैं, ज़ुकिनी 1.5 से 3 फीट लम्बे या फिर गोल हो सकते हैं।

ज़ुकिनी की किस्मों में ऑस्ट्रेलियन ग्रीन 4-5, अर्ली यलो प्रोलीफिक, पूसा पसंद, पैटीपैन आदि सामिल है। यह फाइबर और न्यूट्रिशंस से भरी हुई सब्जी होती है। इसे खाने से आंखों की परेशानी, उम्र के कारण होनेवाले दाग-धब्बे में, हड्डियों को मजबूत करने में, बीपी नियंत्रित में, ब्लड फ्लो बनाए रखने और टाइप-2 डायबीटीज में, पाचन आदि में मदद करती है।
ज़ुकिनी

किस्में:- ज़ुकिनी की किस्मों में ऑस्ट्रेलियन ग्रीन 4-5, अर्ली यलो प्रोलीफिक, पूसा पसंद, पैटीपैन आदि शामिल है।

फायदे:- यह फाइबर और न्यूट्रिशंस से भरी हुई सब्जी होती है। इसे खाने से आंखों की परेशानी, उम्र के कारण होनेवाले दाग-धब्बे में, हड्डियों को मजबूत करने में, बीपी नियंत्रित में, ब्लड फ्लो बनाए रखने और टाइप-2 डायबीटीज में, पाचन आदि में मदद करती है।

जलवायु एवं मिट्टी:- यह फसल ज्यादा ठंड और पाला नहीं सह सकती इसीलिए इसे गर्म जलवायु जहाँ का तापमान 20° – 40° सेल्सियस चाहिए। लगभग 30° सेल्सियस तापमान फसल के लिए उपयुक्त होता है।

साथ ही बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास का उत्तम प्रबंध हो और जिसका pH मान 6.5 हो खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती के लिए ज्यादा पोषण तत्व वाले मिट्टी की जरुरत नहीं होती लेकिन अच्छी और उपजाऊ मिट्टी में फसल अच्छी होती है। इसीलिए खेती करने से पहले मिट्टी की जांच करवाना अच्छा होता है।

खेत की तैयारी:- ज़ुकिनी की खेती के लिए खेत की 3- 4 बार जुताई कर नाली और थालों की व्यवस्था कर दे। इसकी बुआई दूसरी फसलों के साथ मेड़ों पर भी की जा सकती है।

बुआई:- एक हेक्टेयर खेत में 7-8 किलो बीज रोपण हो सकता है। ज़ुकिनी की अंकुरित बीजों को 1-1.5 मीटर की दूरी पर 0.3 – 0.4 मीटर चौड़ी नालि के दोनों किनारों पर 60-75 सेंटीमीटर की दूरी पर बुआई की जाती है।

सिंचाई:- यह एक ग्रीष्मकालीन फसल है जिस वजह से इसकी हफ्ते भर के अन्तर पर सिंचाई की जरुरत पड़ती है। पहली सिंचाई बीज रोपने के तुरंत बाद करें। ऑफ सीजन में खेती करने पर पौधों को पाले से बचाना होता है।

ज़ुकिनी की खेती के लिए खेत की 3- 4 बार जुताई कर नाली और थालों की व्यवस्था कर दे। इसकी बुवाई दूसरी फसलों के साथ मेड़ों पर भी की जा सकती है।
ज़ुकिनी की खेती

खाद एवं उर्वरक:- इसकी अच्छी फसल के लिए इसमें प्रति हेक्टेयर 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट, बीज बुआई के 2-3 हफ्ते पहले मिट्टी में मिला दें। इसके साथ में ही प्रति हेक्टेयर 100 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस और पोटाश लें।

फास्फोरस और पोटाश के साथ 1/3 नाइट्रोजन नालियों में डाल कर मिट्टी में मिला दें। बुआई के 1 महीने बाद बाकी बचे हुए नाइट्रोजन को दो बराबर मात्रा में नालियों में देकर, गुड़ाई कर मिट्टी चढ़ा दे। पौधों के विकास के समय भी इसका इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से किया जा सकता है।

उत्पादन और मुनाफा:- बीज रोपने के 1-1.5 महीने में पौधे में फल आने लगते हैं और 60-70 दिन में खत्म हो जाती है। बाजार में इसका दाम भी बहुत अच्छा मिलता है।

फसलबाज़ार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Language»