परिचय:- घृतकुमारी को एलोवेरा के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन समय से चिकित्सा जगत में बीमारियों के उपचार के लिए इसका प्रयोग किया जा रहा है। इसके गुणों से हम सभी भली-भांति परिचित हैं तथा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से इसका उपयोग भी करते है। आयुर्वेदिक उद्योग में घृतकुमारी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
एक बार लगाने पर 3 से 5 साल तक उपज देने वाले इस पौधे को खेत की मेड पर भी लगा सकते है। एलोवेरा को कोई जानवर भी नही खाता है तथा अतिरिक्त कमाई भी हो सकती है। आयुर्वेदिक दवाओं की खेती किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है।
लागत:- प्रति फसल प्रति एकड़ लगभग चार सौ क्विंटल एलोवेरा का उत्पादन होता है। जो ढाई सौ रूपये प्रति क्विंटल बिक जाता है। यदि आप कंपनी की देख रेख में खेती कर रहे हों तो विशेषज्ञ का निरीक्षण करते मार्गदर्शन भी करते हैं।
एक बार एलोवेरा को लगाने के बाद चार वर्ष तक बराबर सात फसलें मिलती है। इसकी खेती पूरी तरह से जौविक होती है इसीलिए सिंचाई के अलावा इस पर अन्य खर्च नहीं होता है।
मृदा एवं जलवायु:- प्राकृतिक रूप से इसके पौधे अनउपजाऊ भूमि में उगते है। इसे किसी भी भूमि में उगाया जा सकता है, बलुई दोमट मिट्टी उत्तम है।
उन्नतशील प्रजातियाँ:- केन-सीतल,एल- 1,2,5 और 49 से अधिक मात्रा में जैल की प्राप्ति हुई है।
पौध रोपाई:- भूमि की एक से दो जुताई के बाद खेत को पाटा लगाकर समतल बना लें। क्यारियों में 50-50 सेमी की दूरी पर पौधों को लगाएं। रोपाई के लिए मुख्य पौधों के बगल से निकलने वाले छोट-छोटे पौधे जिसमें चार-पाँच पत्तियाँ हों, का चयन करें। फरबरी माह रोपाई के लिये उत्तम माना गया है।
खाद एवं उर्वरक:- 10–12 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद पौधे के अच्छे विकास के लिए आवश्यक है। इसके साथ नेत्रजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश भी उचित मात्रा में दें।
सिंचाई:- पौधों की रोपाई के बाद खेत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर से पानी दें इससे सिंचाई अच्छी रहती है। समय से सिंचाई करने पर पत्तियों में जैल का उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। वर्ष भर में 3–4 सिंचाई की आवश्यक है।
रोग एवं कीट नियन्त्रण:- समय-समय पर खेत से खरपतवारों को निकालते रहें। खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा बढऩे पर खरपतवारनाशी का भी प्रयोग कर सकते हैं। ऊँची उठी हुई क्यारियों की समय-समय पर मिट्टी चढ़ाते रहें।
जिससे पौधों की जड़ों के आस-पास पानी के रूकने की सम्भावना कम होती है एवं साथ ही पौधों को गिरने से भी बचाया जा सकता है। पौधों पर रोगों का प्रकोप कम ही होता है। कभी-कभी पत्तियों एवं तनों के सडऩे एवं धब्बों वाली बीमारियों के प्रकोप को देखा गया है। जो कि फफूंदी जनित बीमारी है।
इसकी नियंत्रण के लिए मैंकोजेब, रिडोमिल, डाइथेन एम-45 का प्रयोग 2.0–2.5 ग्राम/ली. पानी में डालकर छिड़काव करने से किया जा सकता है। ग्वारपाठा के पौधों को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है, परंतु खेत में हल्की नमी बनी रहे व दरारें नहीं पड़ना चाहिए।
इससे पत्तों का लुबाब सूख कर सिकुड़ जाते हैं। बरसात के मौसम में संभालना ज्यादा जरूरी होता है। खेत में पानी भर जाए तो निकालने का तत्काल प्रबंध करें। लगातार पानी भरा रहने पर इनके तने (पत्ते) और जड़ के मिलान स्थल पर काला चिकना पदार्थ जमकर गलना शुरू हो जाता है।
घृतकुमारी(एलोवेरा) फसल की कटाई एवं इसके प्रसंस्करण।
फसल की कटाई एवं उपज:- रोपाई के 10–15 महिनों में पत्तियाँ पूर्ण विकसित एवं कटाई के योग्य हो जाती हैं। पौधे की ऊपरी एवं नई पत्तियों की कटाई नहीं करें। निचली एवं पुरानी 3–4 पत्तियों को पहले काटना/तोडें।
इसके बाद लगभग 45 दिन बाद पुन: 3–4 निचली पुरानी पत्तियों की कटाई/तुड़ाई करें। इस प्रकार यह प्रक्रिया तीन-चार वर्ष तक दोहराई जा सकती है। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल से लगभग प्रतिवर्ष 50–60 टन ताजी पत्तियों की प्राप्ति होती है।
दूसरे एवं तीसरे वर्ष 15–20 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। ग्वारपाठे के एक स्वस्थ पौधे से 400 ग्राम (मिली) गूदा भी निकलती है यदि इसका कम से कम बिक्री भाव 100 रु. प्रति किग्रा भी लगाया जाए तो आठ लाख रुपए होता है।
ये सब अनुमानित आकलन है वैसे पत्तियों को सीधा काट कर बेचा जाये तो 3 से 6 रूपये किलो बाजार में बिकती है और एक पौधे में ओसत 3 से 5 किलो वजन आता है। 3 से 5 लाख प्रति एकड़ कमा सकते हो।
कटाई उपरान्त प्रबंन्धन एवं प्रसंस्करण:- विकसित पौधों से निकाली गई, पत्तियों को सफाई करने के बाद स्वच्छ पानी से अच्छी तरह से धो लिया जाता है, जिससे मिट्टी निकल जाती है। इन पत्तियों के निचले सिरे पर अनुप्रस्थ काट लगा कर कुछ समय के लिए छोड़ देते हैं, जिससे पीले रंग का गाढ़ा रस निकलता है।
इस गाढ़े रस को किसी पात्र में संग्रह करके वाष्पीकरण की विधि से उबाल कर, घन रस क्रिया द्वारा सुखा लेते है। इस सूखे हुए द्रव्य को मुसब्बर अथवा सकोत्रा, जंजीवर, केप, बारवेडोज एलोज एवं अदनी आदि अन्य नामों से विश्व बाजार में जाना जाता है।
घृतकुमारी की जातिभेद एवं रस क्रिया में वाष्पीकरण की प्रक्रिया के अन्तर से मुसब्बर के रंग, रूप, तथा गुणों में भिन्नता पाई जाती है।
फायदेमंद है एलोवेरा:- घृतकुमारी त्वचा से जुड़ी कई तरह की बिमारियों के लिए काफी अधिक फायदेमंद होता है। एलोवेरा त्वचा की खुश्की को दूर करने वाले साबुन बनाने और कई बीमारियों की आयुर्वेदिक औषधि के रुप में काम आता है। स्थानीय स्तर पर इसकी तैयार फसल की खरीद पौध देने वाली एजेंसी ही कर लेती है।
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