नाशपाती की खेती, किस्में तथा व्यापारिक लाभ।

नाशपाती के फल खाने में कुरकुरे, रसदार और स्वदिष्ट तथा पोषक तत्व से भरपूर होते हैं। यह सयंमी क्षेत्र का महत्वपूर्ण फल है।

परिचय:- नाशपाती के फल खाने में कुरकुरे, रसदार और स्वादिष्ट तथा पोषक तत्व से भरपूर होते हैं। यह सयंमी क्षेत्र का महत्वपूर्ण फल है।

इसकी खेती भारत के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र से लेकर घाटी, तराई और भावर क्षेत्र तक में होती है। भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश तथा कम सर्दी वाली किस्मों की खेती उप-उष्ण क्षेत्रों में की जाती है।

नाशपाती की खेती वैज्ञानिक तकनीक से करने पर अधिकतम और गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त होते हैं।

नाशपाती के फल की तुराई जून के प्रथम सप्ताह से सितम्बर के मध्य तक की जाती है।नज़दीकी मंडियों में फल पूरी तरह से पकने के बाद तथा दूरी वाले स्थानों पर हरे फल तोड़ कर ले जाए जाते है।
नाशपाती

उपयुक्त जलवायु:- इसकी खेती गर्म आर्द्र उपोष्ण मैदानी क्षेत्रों से लेकर शुष्क शीतोष्ण ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से की जाती है।

इसके लिए 500-15000 घंटे तक शीत तापमान 7 डिग्री सेल्सियस से कम आदर्श है। सर्दी में पड़ने वाले पाले और कोहरे से इसके फूलों को बहुत नुकसान होता है।

भूमि का चयन:- खेती के लिए मध्यम बनावट वाली बलुई दोमट तथा गहरी मिट्टी उत्तम मानी जाती है। जिसमें जल निकास की व्यवस्था हो, यह एक पर्णपाती फल है।

उन्नत किस्में

अगेती किस्में – अर्ली चाईना, लेक्सटन सुपर्ब, थम्ब पियर, शिनसुई, कोसुई, सीनसेकी इत्यादि।

ध्यआदिम किस्में – बारटलैट, रैड बारटलैट, मैक्स-रैड बारटलैट, कलैप्स फेवरट इत्यादि।

पछेती किस्में – कान्फ्रेन्स (परागण), डायने डयूकोमिस, काश्मीरी नाशपाती इत्यादि।

मध्यवर्ती, निचले क्षेत्र व घाटियों हेतु – पत्थर नाख, कीफर (परागण), चाईना नाशपाती, गोला, होसुई, पंत पीयर-18 इत्यादि।

अर्ली चाईना – यह सबसे पहले पकने वाली किस्म है। इसके फल गोल आकार वाले, मीठे व कम भण्डारण क्षमता वाले होते हैंं। जून महीने में फल पक जाते हैं।

लेक्सटन सुपर्ब – फल लम्बूतरा, खुरदरा, पतला तथा पीले और हरे छिलके वाला, मीठा, रसदार तथा उत्तम गुणवत्ता वाला होता है। इसकी पैदावार अधिक होती है।

रैड बारटलैट – यह मध्यम से बड़े आकार का फल, गूदा सफेद रंग का, रसीला, कुरकुरा, खुशबूदार, घुलने वाला, नरम फल है।

जून के अन्तिम सप्ताह से मध्यम जुलाई तक पकने वाली यह किस्म व्यापारिक स्तर पर अधिक लाभदायक है।

कान्फ्रेन्स – इस किस्म के फल मध्य आकार का, हरे छिलके वाला होता है तथा पकने पर पीला, गूदा सफेद हल्के गुलाबी रंग का, मीठा, रसदार, अच्छी सुगन्ध वाला होता है।

डायने डयूकोमिस – अक्तूबर में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म का फल आयताकार, थोड़ी गोलाई वाला, छिलका खुरदरा, दानेदार, पीले रंग का थोड़ा गेहूँआ रंग वाला, गूदा मीठा, स्वादिष्ट, सुगंधित, कोमल व रसीला होता है।

काश्मीरी नाशपाती – छोटे आकार वाला यह फल हरे रंग का, पीली गुदा वाला रसीला तथा मीठा है।इस किस्म में नियमित रूप से अधिक फल होते हैं।

कीफर – फल बड़े आकार का, सुनहरे पीले रंग का, कुरकुरा, निम्न कोटि की गुणवत्ता वाला होता है। इसका उपयोग संसाधन निर्माण में होता है।

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नाशपाती की पौध रोपण एवं सिंचाई प्रबन्धन

पौधे तैयार करना:- सामान्य स्थिति में नाशपाती के पौधे कैन्थ या शियारा के बीज से निर्मित मूलवृन्त पर कलम करके तैयार किये जाते हैं।

अत्यधिक अंकुरण हेतु कैन्थ के बीजों को 35 से 45 दिनों तक 2 से 5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर नमी वाले रेत में स्तरित भी किया जा सकता है।

मूलवृंत

कैन्थ एवं शियारा – यह एक जंगली पौधा होता है, जो गहरी जड़ों वाला, सुखे की स्थिति को झेलने में सक्षम तथा अधिक बढ़त वाला होता है। लेकिन शियारा पर पौधे कैन्थ की अपेक्षा अधिकऔर जल्दी विकास करते हैं।

क्लोनल रूट स्टॉक – यह एक मध्य बौना मूलवृंत है, जिस पर पौधों का आकार लगभग दूसरे पेड़ों से 50 से 60 प्रतिशत कम होता है। यह व्यावसायिक नहीं हैं।

क्लैफ्ट ग्राफ्टिंग – जहां जंगली कैथ की उपलब्धता हो वहां पर जनवरी से फरवरी में क्लैफ्ट ग्राफ्टिंग द्वारा नाशपाती की उन्न्त किस्मों के पौधों में बदला जाता है।

पौध रोपण:- नाशपाती की खेती के लिए सामान्य रूप से तैयार किये गये पौधों के बीच 5*5 मीटर की दूरी तथा क्लोनल के लिए 3*3 मीटर तक दूरी रखी जाती है।

ढलानदार क्षेत्रों में नाशपाती के पोधे छोटे-छोटे खेत में तथा समतल घाटियों वाले क्षेत्रों में वर्गाकार, षट्कोणाकार, आयताकार विधि से लगाय जा सकते हैं।

नाशपाती के पौधे पर बीमों पर फल लगते हैं इसलिए 8 से 10 वर्षों में इनका नवीनीकरण आवश्यक है। इससे स्वस्थ बीमे नई शाखाओं पर आ सके और स्वास्थ्य फल मिले।
नाशपाती की खेती

कटाई-छटाई:- उलझी हुई, सूखी, टूटी तथा रोग ग्रस्त शाखाओं को पेड़ों से काटकर अलग कर दें। तथा सुसुप्तावस्था में शाखाओं के ऊपर का एक चौथाई भाग काट दें। ताकि अधिक वानस्पतिक वृद्धि न हो।

नाशपाती के पौधे पर बीमों पर फल लगते हैं इसलिए 8 से 10 वर्षों में इनका नवीनीकरण आवश्यक है। इससे स्वस्थ बीमे नई शाखाओं पर आ सके और स्वास्थ्य फल मिले।

खाद और उर्वरक:- इसके खाद तथा उर्वरकों की प्रयोगों पर आधारित प्रमाणित सिफारिशें नहीं हैं। इसमें सेब की ही भांति उर्वरक तथा खाद डाली जाती है।

बोरॉन की कमी के लिए नाशपाती के पौधे अति संवेदनशील होते है। इसके अभाव में छोटी अवस्था के कच्चे फल फट जाते हैं तथा परिपक्व होते-होते फल पर जगह जगह पर धब्बे पड़ जाता है।

इससे बचाव हेतु बोरिक एसिड 1 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए।

सिंचाई प्रबन्धन:- नाशपाती को वर्ष में 75 से 100 सेंटीमीटर वितरित बारिश की आवश्यकता होती है। रोपाई के बाद नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है।

गर्मियों में 5 से 7 दिन तथा सर्दियों में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें।

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खरपतवार नियंत्रण एवं किट रोकथाम।

खरपतवार नियंत्रण:- खरपतवार रोकथाम हेतु ग्लाइफोसेट 1.2 लीटर और पैराकुएट 1.2 को 200 लीटर पानी में मिला के प्रति एकड़ में छिड़काव करें।

अंतर-फसलें:- अंतरफसल के रूप में खरीफ ऋतु में उड़द, मूंग, तोरियों जैसे फसलें और रब्बी में गेंहू, मटर, चने या सब्जियां आदि लगाई जा सकती है।

किट व रोकथाम

सैंजो स्केल – यह सेब तथा नाशपाती के लिए सबसे खतरनाक रेंगने वाला किट है। इससे प्रकोपित पौधों की छाल पर भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं।

रोकथाम हेतु क्लोरपाइरीफॉस 0.04 प्रतिशत, 400 मिलीलीटर 20 ईसी का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

व्हाईट स्केल – यह नाशपाती वृक्ष की छोटी शाखाओं, बीमों तथा फलों पर दलपुंज में देखा जाता है।

रोकथाम हेतु प्रभावित पौधों पर सितम्बर और अक्तूबर में फल तोड़ने के बाद क्लोरपाइरीफॉस का छिड़काव उचित मात्रा में करें।

चेपा और थ्रिप्स – यह नाशपाती पौधे के पत्तों का रस चूसते है जिसके फलस्वरूप पत्ते पीले पड़ जाते हैं।

रोकथाम हेतु जब पत्ते झड़ना शुरू हो तो इमीडाक्लोप्रिड 60 मिलीलीटर या थाईआमिथोकसम 80 ग्राम को प्रति 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग व रोकथाम

जड़ गलन – इस बीमारी में पौधे की छाल तथा लकड़ी भूरे रंग की हो जाती है। पौधे पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है।

रोकथाम हेतु कॉपर आक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिला कर मार्च महीने में छिड़काव करें तथा जून में दोबारा छिड़काव करें।

तुड़ाई:- नाशपाती के फल की तुराई जून के प्रथम सप्ताह से सितम्बर के मध्य तक की जाती है।नज़दीकी मंडियों में फल पूरी तरह से पकने के बाद तथा दूरी वाले स्थानों पर हरे फल तोड़ कर ले जाए जाते है।

देरी से तोड़ने पर फलों को ज्यादा समय के लिए भण्डारण नहीं किया जा सकता है और इसका रंग और स्वाद भी खराब हो जाता है।

पैदावार:- साधारणतया नाशपाती के एक वृक्ष से 1 से 2 क्विटंल तक फल प्राप्त हो जाते है। प्रति हैक्टर क्षेत्र से 500 से 700 क्विंटल फल प्राप्त हो सकते है, जिससे अच्छी आमदनी हो सकती है।

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